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Ab tak

 हमारे दिल न तुम पूछो कि क्या क्या खो चुके अबतक, न जाने कौन सी महफ़िल जो' बाकी रो चुके अबतक मिरी आँखे सतातीं हैं कि उसको आँख भर देखूँ, कि अरमां जग चुके कितने कि कितने सो चुके अबतक दिल-ए-परदा न तू घबरा कि ये नाटक हुआ सारा, कि कितने जी चुके अबतक कि कितने सो चुके अबतक बड़ी देरी करी ज़ालिम कि काबे से निकलने में, ज़ियादा थम सका ना दिल बुतों के हो चुके अबतक न पूछा कीजिये 'क्या हाल है मेरे बिना तेरा', न जानूँ क्या रहा बाक़ी कि जी तो खो चुके अबतक मिरा मरना हुआ दौर-ए-समाँ आना हुआ चौबे, कि कितने हँस चुके अबतक कि कितने रो चुके अबतक - पंडित आयुष्य चतुर्वेदी